प्रधान संपादक : - मुकेश भारती : जब अपराध की पृष्ठभूमि वाले हाथों में आ जाए कलम, पत्रकारिता की साख पर लगने लगते हैं दाग
Mukesh Kumar Bharti
Thu, Nov 5, 2026
कोरबा। पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। यह सत्ता से सवाल करने, व्यवस्था की खामियों को उजागर करने और आम आदमी की आवाज को मंच देने का सशक्त माध्यम है। लेकिन जब इसी पेशे की आड़ में निजी स्वार्थ साधने, प्रभाव जमाने और कथित तौर पर लोगों को भयभीत कर अपना हित पूरा करने की कोशिश होने लगे तो सवाल केवल किसी एक व्यक्ति के आचरण पर नहीं, बल्कि पूरी पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर खड़ा होता है। कोरबा में पिछले कुछ वर्षों के दौरान उभरी कुछ गतिविधियां इसी गंभीर चिंता को सामने ला रही हैं।
अब्दुल सुल्तान का नाम भी इसी संदर्भ में चर्चा में रहा है। उनके खिलाफ आधा दर्जन से अधिक आपराधिक प्रकरण दर्ज होने की बात सामने आती रही है। सवाल यह है कि आपराधिक पृष्ठभूमि से जुड़े किसी व्यक्ति के पत्रकारिता के क्षेत्र में आने के बाद यदि पेशे की मर्यादाओं और जिम्मेदारियों को ताक पर रखकर गतिविधियां संचालित होने लगें तो इसका असर समाज और पत्रकारिता दोनों पर पड़ना स्वाभाविक है। कलम की ताकत का इस्तेमाल जनहित के बजाय व्यक्तिगत प्रभाव और दबाव बनाने के लिए होने लगे तो पत्रकारिता का मूल उद्देश्य ही पीछे छूट जाता है।
वर्ष 2018 में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद प्रदेश के राजनीतिक समीकरण बदले। इसी दौर में कोरबा में भी कुछ लोगों की राजनीतिक नजदीकियों और रसूख के सहारे अपना प्रभाव स्थापित करने की कोशिशें तेज हुईं। आरोप है कि कांग्रेस के एक प्रभावशाली नेता के पिता से निकटता का लाभ उठाकर अब्दुल सुल्तान ने भी अपना दायरा बढ़ाया। इसी दौरान मीडिया के नाम पर एक पोर्टल का संचालन शुरू किया गया। शुरुआत में इसे समाचारों के प्रसार का माध्यम बताया गया, लेकिन धीरे-धीरे इसकी कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठने लगे।
आरोपों के मुताबिक, खबरों की बुनियादी कसौटी माने जाने वाले तथ्यों, दस्तावेजों और दूसरे पक्ष के विचारों को दरकिनार कर प्रभावशाली व्यक्तियों, अधिकारियों और औद्योगिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने वाली सामग्री प्रसारित की जाने लगी। समाचार का उद्देश्य किसी गड़बड़ी को सामने लाना और जवाबदेही तय कराना होता है, लेकिन जब किसी व्यक्ति या संस्थान को लगातार निशाने पर लेकर एकतरफा सामग्री प्रकाशित की जाए तो उसकी मंशा पर सवाल उठना लाजिमी है। यही वह बिंदु है जहां खोजी पत्रकारिता और कथित दबाव बनाने की गतिविधियों के बीच अंतर करना आवश्यक हो जाता है।
कोरबा जैसे औद्योगिक जिले में बड़े औद्योगिक घरानों, सार्वजनिक उपक्रमों और प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। ऐसे संस्थानों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना पत्रकारिता का अधिकार ही नहीं, बल्कि दायित्व भी है। मगर सवालों के नाम पर किसी की छवि को नुकसान पहुंचाने, अपुष्ट तथ्यों को खबर का रूप देने और कथित तौर पर व्यक्तिगत हित साधने की शिकायतें सामने आएं तो यह गंभीर विषय बन जाता है। आरोप है कि इसी तरह की कार्यप्रणाली के माध्यम से पिछले छह-सात वर्षों से एक ऐसा सिलसिला चलाया जा रहा है, जिसे स्थानीय स्तर पर येलो जर्नलिज्म के रूप में देखा जा रहा है।
राजनीतिक सत्ता के बदलने के साथ इस पूरे घटनाक्रम का स्वरूप भी बदलता दिखाई दिया। कांग्रेस शासनकाल में जिन राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में कथित पहुंच का लाभ उठाया जाता था, सत्ता परिवर्तन के बाद भाजपा शासन में नए समीकरण बनाने की कोशिशें शुरू हो गईं। राजनीतिक विचारधारा और सत्ता के चेहरे बदलते रहे, लेकिन आरोप है कि प्रभाव और दबदबा कायम रखने की रणनीति में कोई खास बदलाव नहीं आया। सत्ता के करीब पहुंचने के लिए नए संपर्क तलाशना और प्रभावशाली लोगों को अपने पक्ष में इस्तेमाल करना इसी कार्यशैली का हिस्सा बताया जा रहा है।
अब सोशल मीडिया इस कथित प्रभाव विस्तार का एक नया और तेज माध्यम बन गया है। इंटरनेट मीडिया पर किसी खबर, पोस्ट या वीडियो के प्रसार की गति इतनी तेज है कि बिना पुष्टि की गई सामग्री भी कुछ ही समय में व्यापक चर्चा का विषय बन जाती है। ऐसे माध्यम का इस्तेमाल यदि जनहित के सवाल उठाने के बजाय चुनिंदा लोगों को निशाना बनाने, उनकी छवि प्रभावित करने अथवा उन पर दबाव बनाने के लिए किया जाए तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। आरोप हैं कि इसी माध्यम को शार्प शूटर की तरह इस्तेमाल कर प्रशासनिक अधिकारियों और प्रभावशाली व्यक्तियों तक दबाव पहुंचाने की कोशिशें की जा रही हैं। अधिकारियों को कथित तौर पर ब्लैकमेल किए जाने की शिकायतें भी इस पूरे मामले को और गंभीर बनाती हैं।
ऐसे मामलों में राजनीतिक संरक्षण, प्रशासनिक निष्क्रियता और पेशे की आड़ में होने वाली कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच जरूरी है। आपराधिक मामलों का रिकॉर्ड, ब्लैकमेलिंग से जुड़ी शिकायतें, प्रसारित खबरों की तथ्यात्मकता और संबंधित लोगों के बीच हुए संवाद की जांच के आधार पर ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
अंततः सवाल सीधा है कि क्या कलम उठाने मात्र से कोई पत्रकार बन जाता है? क्या प्रेस कार्ड और पोर्टल का नाम किसी व्यक्ति को कानून और जवाबदेही से ऊपर कर देता है? पत्रकारिता की आड़ में यदि कोई व्यक्ति अपने कथित प्रभाव का इस्तेमाल निजी हितों के लिए करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी ही चाहिए। क्योंकि अपराध की पृष्ठभूमि और पत्रकारिता की पहचान को एक-दूसरे का पर्याय नहीं बनाया जा सकता। कलम की प्रतिष्ठा उसके शब्दों की विश्वसनीयता से बनती है, किसी राजनीतिक दरबार में पहुंच या दूसरों पर बनाए गए दबाव से नहीं।
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