: इस कलिकाल में भी मोक्षदायिनी है श्रीमद्भागवत कथा - पं० राहुल दुबे
रायपुर - श्रीमद्भागवत कथा को अमर कथा माना गया है , यह कथा हमें मुक्ति का मार्ग दिखलाती हैं। जो जीव श्रद्धा और विश्वास के साथ मात्र एक बार इस कथा को श्रवण कर लेता है उनका जीवन सुखमय हो जाता है , वह सदैव के लिये मोक्ष की प्राप्ति कर लेता है और उसे सांसारिक बंधनों के चक्कर मे आना नही पड़ता। इस कलिकाल में मोक्ष दिलाने वाला श्रीमद्भागवत महापुराण कथा से कोई अन्य श्रेष्ठ मार्ग नही है। इस कलियुग में भी मनुष्य श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण कर अपना कल्याण कर सकता हैं , वह भगवान के नाम स्मरण मात्र से भगवत् शरणागति की प्राप्त कर अपने जीवन को धन्य बना सकता है।
उक्त बातें बेमेतरा छत्तीसगढ़ हींगलाज सेना के द्वारा उत्तराखंड स्थित श्रीबद्रीनाथ धाम की पावन धरा में आयोजित संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिवस भागवताचार्य पं० राहुल दुबे ने सप्तम दिवस भक्तों को कथा का रसपान कराते हुये कही। महाराजश्री ने बताया कि परीक्षित को ऋषि पुत्र द्वारा सातवें दिन मरने का श्राप दिया गया था। उन्होंने अन्य उपाय के बजाय श्रीमद्भागवत की कथा का श्रवण किया और मोक्ष को प्राप्त कर भगवान के बैकुण्ठ धाम को चले गये। ऐसे श्रीमद्भागवत कथा श्रवण करने का सौभाग्य केवल श्रीकृष्ण की असीम कृपा से ही प्राप्त हो सकती है। कथा सुनाने के बाद श्रीशुकदेवजी ने राजा परिक्षित को पूछा राजन् मरने से डर लग रहा हैं क्या ? तब राजा ने कहा महाराज मृत्यु तो केवल शरीर की होती हैं आत्मा तो अमर होती हैं , भागवत कथा सुनने के बाद अब मेरा मृत्यु से कोई डर नही हैं औऱ अब मैं भगवत्प्राप्ति करना चाहता हूँ। मुझे कथा श्रवण कराने वाले सुकदेवजी आपकों कोटि-कोटि मेरा प्रणाम कहकर परीक्षित ने श्री शुकदेवजी को विदा किया। इसके बाद तक्षक सर्प आया और राजा परीक्षित के शरीर को डसकर लौट गया। परीक्षित की आत्मा तो पहले ही श्रीकृष्ण की चरणारविन्द में समा चुकी थी और कथा के प्रभाव से अंत में उन्हें मोक्ष प्राप्त हो गया। महाराजश्री ने बताया कि श्रीमद्भागवत कथा सुनने के प्रभाव से राजा परीक्षित को मोक्ष प्राप्त होता है। परीक्षित को जब मोक्ष हुआ तो ब्रह्माजी ने अपने लोक में तराजू के एक पलडे़ में सारे धर्म और दूसरे में श्रीमद्भागवत को रखा तो भागवत का ही पलड़ा भारी रहा। अर्थात श्रीमद्भागवत ही सारे वेद पुराण शास्त्रों का मुकुट है। इधर पिता की मृत्यु को देखकर राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय क्रोधित होकर सर्प नष्ट हेतु आहुतियांँ यज्ञ में डलवाना शुरू कर देते हैं जिनके प्रभाव से संसार के सभी सर्प यज्ञ कुंडों में भस्म होना शुरू हो जाते हैं तब देवता सहित सभी ऋषि मुनि राजा जनमेजय को समझाते हैं और उन्हें ऐसा करने से रोकते हैं। इसके पहले आचार्यश्री ने सुदामा चरित्र की कथा पर प्रकाश डालते हुये कहा कि सुदामा संसार में सबसे अनोखे भक्त रहे हैं। वे जीवन में जितने गरीब नजर आये , उतने ही वे मन से धनवान थे। उन्होंने अपने सुख व दुखों को भगवान इच्छा पर सौंप दिया था। जब सुदामा द्वारिकापुरी पहुंचे तो द्वारपाल के मुख से सुदामा का नाम सुनते ही द्वारिकाधीश नंगे पांव मित्र की अगुवानी करने राजमहल के द्वार पर पहुंचे। बचपन के मित्र को गले लगाकर भगवान श्रीकृष्ण उन्हें राजमहल के अंदर ले गये और अपने सिंहासन पर बैठाकर स्वयं अपने हाथों से उनके पांव पखारे। आचार्यजी ने कहा कि सुदामा से भगवान ने मित्रता का धर्म निभाया और दुनियां के सामने यह संदेश दिया कि जिसके पास प्रेम धन है वह निर्धन नहीं हो सकता। राजा हो या रंक मित्रता में सभी समान हैं और इसमें कोई भेदभाव नहीं होता। मनुष्य को जीवन में श्रीकृष्ण की तरह मित्रता निभानी चाहिये। कथा के अंतिम दिन श्रोताओं की खूब भीड़ रही , इस दिन महाराजश्री ने यदुवंश को ऋषियों का श्राप , यदुकुल का संहार , कलियुग का वर्णन करते हुये गीता पाठ और तुलसी वर्षा , पूर्णाहुति हवन के साथ श्रीमद्भागवत कथा का विश्राम हुआ। इस दौरान सभी हरिभक्तों ने कथा श्रवण कर चढ़ोत्री में भाग लिया , वहीं इस कथा में जोशीमठ के श्रीमज्जगदुरु शंकराचार्य स्वामी श्रीअविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती महाराज ने विशेष रूप से कथास्थल पहुंचकर भक्तों को आशीर्वाद प्रदान किया। इस कथा में श्रीमति चन्द्रकला तिवारी , निक्की तिवारी , राजेश शर्मा , कविता शर्मा , रश्मि दुबे , बसंत पाण्डेय , प्रभाती पाण्डेय , सरोज उपाध्याय और सीमा तिवारी सहित असंख्य धर्मप्रेमी विशेष रूप से उपस्थित रहे।
Tags :
विज्ञापन
विज्ञापन